चाणक्य नीति
(चाणक्य नीति
- सोलहवां अध्याय)
Chanakya Neeti - Sixteenth
Chapter
चाणक्य नीति , लगभग 2400 वर्ष पूर्व नालंदा विश्विधालय के महान आचर्य चाणक्य द्वारा लिखित एक महान
ग्रन्थ है जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना उस समय था। चाणक्य नीति में कुल
सत्रह अध्याय है। यहाँ प्रस्तुत है चाणक्य नीति का सोलहवां अध्याय।
1: संसार के
उद्धार के लिए जिन लोगो ने विधिपूर्वक परमेश्वर का ध्यान नहीं किया, स्वर्ग में समर्थ धर्म का उपार्जन नहीं किया, स्वप्न
में भी सुन्दर युवती के कठोर स्तनों और जंघाओं के आलिंगन का भोग नहीं किया,
ऐसे व्यक्ति का जन्म माता के यौवन रूपी वन को काटने वाली कुल्हाड़ी
के समान है।
2: आचार्य चाणक्य का मानना है कि कुलटा (चरित्रहीन) स्त्रियों का
प्रेम एकान्तिक न होकर बहुजनीय होता है। उनका कहना है की कुलटा स्त्रियां पराए
व्यक्ति से बातचीत करती है, कटाक्षपूर्वक देखती है और अपने
ह्रदय में पर पुरुष का चिंतन करती है, इस प्रकार चरित्रहीन
स्त्रियों का प्रेम अनेक से होता है।
3: जो मुर्ख व्यक्ति माया के मोह में वशीभूत होकर यह सोचता है कि
अमुक स्त्री उस पर आसक्त है, वह उस स्त्री के वश में होकर
खेल की चिड़िया की भांति इधर-से-उधर नाचता फिरता है।
4: आचार्य चाणक्य का कहना है कि इस संसार में कोई भाग्यशाली व्यक्ति
ही मोह-माया से छूटकर मोक्ष प्राप्त करता है। उनका कहना है ,'धन-वैभव को प्राप्त करके ऐसा कौन है जो इस संसार में अहंकारी न हुआ हो,
ऐसा कौनसा व्यभिचारी है, जिसके पापो को
परमात्मा ने नष्ट न कर दिया हो, इस पृथ्वी पर ऐसा कौन धीर पुरुष है, जिसका मन स्त्रियों
के प्रति व्याकुल न हुआ हो, ऐसा कौन पुरुष है, जिसे मृत्यु ने न दबोचा हो, ऐसा कौन सा भिखारी है
जिसे बड़प्पन मिला हो, ऐसा कौनसा दुष्ट है जो अपने सम्पूर्ण दुर्गुणों के साथ इस संसार से कल्याण-पथ पर अग्रसर हुआ हो।'
5: स्वर्ण मृग न तो ब्रह्मा ने रचा था और न किसी और ने उसे बनाया था,
न पहले कभी देखा गया था, न कभी सुना गया था,
तब श्री राम की उसे पाने (मारीच का मायावी रूप कंचन मृग) की इच्छा
हुई, अर्थात सीता के कहने पर वे उसे पाने के लिए दौड़ पड़े।
किसी ने ठीक ही कहा है,'विनाश काले विपरीत बुद्धि।' जब विनाश काल आता है, तब बुद्धि नष्ट हो जाती है।

6: आचार्य चाणक्य का मत है कि व्यक्ति अपने गुणों से ऊपर उठता
है। ऊंचे स्थान पर बैठ जाने से ही ऊंचा नहीं हो जाता। उदाहरण के लिए महल की चोटी
पर बैठ जाने से कौआ क्या गरुड़ बन जाएगा।
7: गुणों की सभी जगह पूजा होती है, न की बड़ी
सम्पत्तियों की। क्या पूर्णिमा के चाँद को उसी प्रकार से नमन नहीं करते, जैसे दूज के चाँद को ?
8: दुसरो के द्वारा गुणों का बखान करने पर बिना गुण वाला व्यक्ति भी
गुणी कहलाता है, किन्तु अपने मुख से अपनी बड़ाई करने पर इंद्र
भी छोटा हो जाता है।
9: जो व्यक्ति विवेकशील है और विचार करके ही कोई कार्य सम्पन्न करता
है, ऐसे व्यक्ति के गुण श्रेष्ठ विचारों के मेल से और भी
सुन्दर हो जाते है। जैसे सोने में जड़ा हुआ रत्न स्वयं ही अत्यंत शोभा को प्राप्त
हो जाता है।
10: जो व्यक्ति किसी गुणी व्यक्ति का आश्रित नहीं है, वह व्यक्ति ईश्वरीय गुणों से युक्त भी कष्ट झेलता है, जैसे अनमोल श्रेष्ठ मणि को भी सुवर्ण की जरूरत होती है। अर्थात सोने में जड़े
जाने के उपरांत ही उसकी शोभा में चार चाँद लग जाते है।

11: जो
धन अति कष्ट से प्राप्त हो, धर्म का त्याग करने से प्राप्त
हो, शत्रुओ के सामने झुकने अथवा समर्पण करने से प्राप्त हो,
ऐसा धन हमे नहीं चाहिए।
12: उस लक्ष्मी (धन) से क्या लाभ जो घर की कुलवधू के समान केवल
स्वामी के उपभोग में ही आए। उसे तो उस वेश्या के समान होना चाहिए, जिसका उपयोग सब कर सके।
13: इस संसार में आज तक किसी को भी प्राप्त धन से, इस जीवन से, स्त्रियों से और खान-पण से पूर्ण तृप्ति
कभी नहीं मिली। पहले भी, अब भी और आगे भी इन चीजो से संतोष
होने वाला नहीं है। इनका जितना अधिक उपभोग किया जाता है, उतनी
ही तृष्णा बढ़ती है।
14: जीवन की समाप्ति के साथ सभी दान, यज्ञ,
होम, बालक्रिया आदि नष्ट हो जाते है, किन्तु श्रेष्ठ सुपात्र को दिया गया दान और सभी प्राणियों पर अभयदान
अर्थात दयादान कभी नष्ट नहीं होता। उसका फल अमर होता है, सनातन
होता है।
15: तिनका हल्का होता है, तिनके से भी हल्की
रुई होती है, रुई से हल्का याचक (भिखारी) होता है, तब वायु उसे उड़ाकर क्यों नहीं ले जाती ? सम्भवतः इस
भय से कि कहीं यह उससे भीख न मांगने लगे।
16: अपमान कराके जीने से तो अच्छा मर जाना
है क्योंकि प्राणों के त्यागने से केवल एक ही बार कष्ट होगा, पर अपमानित होकर जीवित रहने से जीवनपर्यन्त दुःख होगा।
17: मधुर वचन सभी को संतुष्ट करते है इसलिए
सदैव मृदुभाषी होना चाहिए। मधुर वचन बोलने में कैसी दरिद्रता ? जो व्यक्ति मीठा बोलता है, उससे सभी प्रसन्न रहते
है।
18: इस संसार रूपी विष-वृक्ष पर दो अमृत के समान मीठे फल लगते है।
एक मधुर और दूसरा सत्संगति। मधुर बोलने और अच्छे लोगो की संगति करने से विष-वृक्ष
का प्रभाव नष्ट हो जाता है और उसका कल्याण हो जाता है।
19: अनेक जन्मो से किया गया दान, अध्ययन और तप
का अभ्यास, अगले जन्म में भी उसी अभ्यास के कारण मनुष्य को सत्कर्मी
की ओर बढाता है, अर्थात वह दूसरे जन्म में भी शास्त्रों के
अध्ययन को दान देने की प्रवृति को और तपस्यारत जीवन को दुसरो के पास तक पहुंचाता है।
20: जो विद्या पुस्तकों में लिखी है और कंठस्थ नहीं है तथा जो धन
दूसरे के हाथो में गया है, ये दोनों आवश्यकता के समय काम
नहीं आते, अर्थात पुस्तको में लिखी विद्या और दूसरे के हाथों
में गए धन पर भरोसा नहीं करना चाहिए।
आप सभी को लेखक एवं संकलन कर्ता:
यानि मेरा - पेपसिह राठौङ तोगावास कि तरफ से
सादर प्रणाम।
आप मुझसे फेसबुक पर भी मिल सकते है व अपना संदेश भेजसकते व चैट
कर सकते है आपके ईन्तजार मे आपका स्नेही-पेपसिंह राठौङ तोगावास
2: आचार्य चाणक्य का मानना है कि कुलटा (चरित्रहीन) स्त्रियों का प्रेम एकान्तिक न होकर बहुजनीय होता है। उनका कहना है की कुलटा स्त्रियां पराए व्यक्ति से बातचीत करती है, कटाक्षपूर्वक देखती है और अपने ह्रदय में पर पुरुष का चिंतन करती है, इस प्रकार चरित्रहीन स्त्रियों का प्रेम अनेक से होता है।
3: जो मुर्ख व्यक्ति माया के मोह में वशीभूत होकर यह सोचता है कि अमुक स्त्री उस पर आसक्त है, वह उस स्त्री के वश में होकर खेल की चिड़िया की भांति इधर-से-उधर नाचता फिरता है।
4: आचार्य चाणक्य का कहना है कि इस संसार में कोई भाग्यशाली व्यक्ति ही मोह-माया से छूटकर मोक्ष प्राप्त करता है। उनका कहना है ,'धन-वैभव को प्राप्त करके ऐसा कौन है जो इस संसार में अहंकारी न हुआ हो, ऐसा कौनसा व्यभिचारी है, जिसके पापो को परमात्मा ने नष्ट न कर दिया हो, इस पृथ्वी पर ऐसा कौन धीर पुरुष है, जिसका मन स्त्रियों के प्रति व्याकुल न हुआ हो, ऐसा कौन पुरुष है, जिसे मृत्यु ने न दबोचा हो, ऐसा कौन सा भिखारी है जिसे बड़प्पन मिला हो, ऐसा कौनसा दुष्ट है जो अपने सम्पूर्ण दुर्गुणों के साथ इस संसार से कल्याण-पथ पर अग्रसर हुआ हो।'
5: स्वर्ण मृग न तो ब्रह्मा ने रचा था और न किसी और ने उसे बनाया था, न पहले कभी देखा गया था, न कभी सुना गया था, तब श्री राम की उसे पाने (मारीच का मायावी रूप कंचन मृग) की इच्छा हुई, अर्थात सीता के कहने पर वे उसे पाने के लिए दौड़ पड़े। किसी ने ठीक ही कहा है,'विनाश काले विपरीत बुद्धि।' जब विनाश काल आता है, तब बुद्धि नष्ट हो जाती है।

6: आचार्य चाणक्य का मत है कि व्यक्ति अपने गुणों से ऊपर उठता है। ऊंचे स्थान पर बैठ जाने से ही ऊंचा नहीं हो जाता। उदाहरण के लिए महल की चोटी पर बैठ जाने से कौआ क्या गरुड़ बन जाएगा।
7: गुणों की सभी जगह पूजा होती है, न की बड़ी सम्पत्तियों की। क्या पूर्णिमा के चाँद को उसी प्रकार से नमन नहीं करते, जैसे दूज के चाँद को ?
8: दुसरो के द्वारा गुणों का बखान करने पर बिना गुण वाला व्यक्ति भी गुणी कहलाता है, किन्तु अपने मुख से अपनी बड़ाई करने पर इंद्र भी छोटा हो जाता है।
9: जो व्यक्ति विवेकशील है और विचार करके ही कोई कार्य सम्पन्न करता है, ऐसे व्यक्ति के गुण श्रेष्ठ विचारों के मेल से और भी सुन्दर हो जाते है। जैसे सोने में जड़ा हुआ रत्न स्वयं ही अत्यंत शोभा को प्राप्त हो जाता है।
10: जो व्यक्ति किसी गुणी व्यक्ति का आश्रित नहीं है, वह व्यक्ति ईश्वरीय गुणों से युक्त भी कष्ट झेलता है, जैसे अनमोल श्रेष्ठ मणि को भी सुवर्ण की जरूरत होती है। अर्थात सोने में जड़े जाने के उपरांत ही उसकी शोभा में चार चाँद लग जाते है।

12: उस लक्ष्मी (धन) से क्या लाभ जो घर की कुलवधू के समान केवल स्वामी के उपभोग में ही आए। उसे तो उस वेश्या के समान होना चाहिए, जिसका उपयोग सब कर सके।
13: इस संसार में आज तक किसी को भी प्राप्त धन से, इस जीवन से, स्त्रियों से और खान-पण से पूर्ण तृप्ति कभी नहीं मिली। पहले भी, अब भी और आगे भी इन चीजो से संतोष होने वाला नहीं है। इनका जितना अधिक उपभोग किया जाता है, उतनी ही तृष्णा बढ़ती है।
14: जीवन की समाप्ति के साथ सभी दान, यज्ञ, होम, बालक्रिया आदि नष्ट हो जाते है, किन्तु श्रेष्ठ सुपात्र को दिया गया दान और सभी प्राणियों पर अभयदान अर्थात दयादान कभी नष्ट नहीं होता। उसका फल अमर होता है, सनातन होता है।
15: तिनका हल्का होता है, तिनके से भी हल्की रुई होती है, रुई से हल्का याचक (भिखारी) होता है, तब वायु उसे उड़ाकर क्यों नहीं ले जाती ? सम्भवतः इस भय से कि कहीं यह उससे भीख न मांगने लगे।
16: अपमान कराके जीने से तो अच्छा मर जाना है क्योंकि प्राणों के त्यागने से केवल एक ही बार कष्ट होगा, पर अपमानित होकर जीवित रहने से जीवनपर्यन्त दुःख होगा।
17: मधुर वचन सभी को संतुष्ट करते है इसलिए सदैव मृदुभाषी होना चाहिए। मधुर वचन बोलने में कैसी दरिद्रता ? जो व्यक्ति मीठा बोलता है, उससे सभी प्रसन्न रहते है।
18: इस संसार रूपी विष-वृक्ष पर दो अमृत के समान मीठे फल लगते है। एक मधुर और दूसरा सत्संगति। मधुर बोलने और अच्छे लोगो की संगति करने से विष-वृक्ष का प्रभाव नष्ट हो जाता है और उसका कल्याण हो जाता है।
19: अनेक जन्मो से किया गया दान, अध्ययन और तप का अभ्यास, अगले जन्म में भी उसी अभ्यास के कारण मनुष्य को सत्कर्मी की ओर बढाता है, अर्थात वह दूसरे जन्म में भी शास्त्रों के अध्ययन को दान देने की प्रवृति को और तपस्यारत जीवन को दुसरो के पास तक पहुंचाता है।
20: जो विद्या पुस्तकों में लिखी है और कंठस्थ नहीं है तथा जो धन दूसरे के हाथो में गया है, ये दोनों आवश्यकता के समय काम नहीं आते, अर्थात पुस्तको में लिखी विद्या और दूसरे के हाथों में गए धन पर भरोसा नहीं करना चाहिए।


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